🥀तन्हाइयों में सुकून है साहब… 🥀
तन्हाइयों में सुकून है साहब,
महफ़िलों में दिल टूट जाते हैं।
भीड़ में अपने कम मिलते हैं,
और अक्सर चेहरे ही चेहरे नज़र आते हैं।
मेरे प्यारे Members,
कभी हम भी महफ़िलों के शौकीन थे,
हर हँसी में अपनी ख़ुशी ढूँढ़ते थे,
हर रिश्ते को सच्चा समझते थे,
हर मुस्कुराते चेहरे को अपना मान लेते थे।
मगर वक़्त ने धीरे-धीरे
एक अलग ही सबक सिखाया।
महफ़िलों में तालियाँ बहुत मिलीं,
पर मुश्किल वक़्त में साथ देने वाले
बहुत कम निकले।
बातें करने वाले हज़ार मिले,
मगर ख़ामोशी समझने वाला
शायद ही कोई मिला।
तब एहसास हुआ
तन्हाई दुश्मन नहीं होती,
कभी-कभी वही सबसे सच्ची दोस्त बन जाती है।
तन्हाई में कोई दिखावा नहीं होता,
कोई झूठी मुस्कान नहीं होती,
कोई मतलब के रिश्ते नहीं होते,
बस अपना दिल होता है
और अपनी रूह की आवाज़ होती है।
तन्हाई ने हमें
खुद से मिलना सिखाया,
अपनी कमज़ोरियों को स्वीकारना सिखाया,
अपनी ताक़त पहचानना सिखाया।
महफ़िलों ने अक्सर
लोगों के चेहरे दिखाए,
लेकिन तन्हाई ने
अपना असली चेहरा दिखाया।
अब शोर से ज़्यादा
सुकून पसंद है,
भीड़ से ज़्यादा
ख़ामोशी पसंद है।
क्योंकि जहाँ दिखावा कम हो,
वहीं दिल को चैन मिलता है।
जो लोग कहते हैं
कि अकेलापन बहुत तकलीफ़ देता है,
शायद उन्होंने
गलत लोगों की भीड़ का दर्द नहीं देखा।
कभी-कभी सौ लोगों के बीच बैठकर भी
इंसान अकेला महसूस करता है,
और कभी अकेले कमरे में बैठकर
अपने आप से बातें करते हुए
दिल को सुकून मिल जाता है।
इसलिए अब शिकायत नहीं,
न किसी से उम्मीद ज़्यादा,
न किसी से नाराज़गी।
जो दिल से अपने हैं,
वे तन्हाई में भी साथ महसूस होते हैं,
और जो सिर्फ़ महफ़िलों के साथी हैं,
वे भीड़ में भी अजनबी लगते हैं।
आख़िर में बस इतना ही...
तन्हाइयों में सुकून है साहब,
महफ़िलों में दिल टूट जाते हैं।
भीड़ अक्सर तालियाँ देती है,
मगर ज़ख्मों पर मरहम
बहुत कम लोग लगाते हैं।
अब हमने तन्हाई से दोस्ती कर ली है,
क्योंकि उसने कभी धोखा नहीं दिया।
उसने हर टूटे हुए पल में
हमें संभालना सिखाया,
हर आँसू के बाद
मुस्कुराना सिखाया।
अब अगर कभी महफ़िल में जाएँ भी,
तो सिर्फ़ मुस्कुराने के लिए,
अपनी पहचान खोने के लिए नहीं।
क्योंकि असली सुकून
भीड़ के शोर में नहीं,
अपने दिल की ख़ामोशी में मिलता है।
और जो इंसान तन्हाई में भी
खुद के साथ खुश रहना सीख जाए,
उसे दुनिया की कोई महफ़िल
अकेला नहीं कर सकती।
Bhagyalakshmi ✍